Monday, September 6, 2010

खेलों का खेल निराला रे भैया

युगों से खेल -कूद , कसरत , योगाभ्यास , कब्बड्डी , और न जाने क्या -क्या खेलों को तवज्जो दी जाती है , प्रतिस्पर्धाओं का चलन कोई नई बात नहीं है , इसी तरह हम अपनी संस्कृति , सभ्यता , संस्कार का आदान -प्रदान करते हैं , हमारे राष्ट्र की पहचान भी बनती है , पहले जानवरों का प्रयोग अधिक मात्र में किया जाता था , अब उनका स्थान मशीनों और उपकरणों ने ले लिया है ,
जो किसान या मजदूर सुबह से लेकर शाम तक काम करता है , वह सोचता है इन लोगों के पास कोई काम नहीं इसलिए खेलते हैं , खेलों के बहाने जानता के बल , धन और समय का नाश करते हैं , अब तो , गरीब भी समझ गया है कि सरकार जनता का ही पैसा किस तरह बहाती है , अनपढ़ भी जानता है कि यदि इस धन का उपयोग बेसिक जरूरतें पूरी करने में लगाया जाता तो कितना अच्छा होता , बच्चों को स्कूल मिल जाता , किसी को घर मिलता , अस्पताल मिल सकता था शायद भोजन भी मिल जाता . 
हम सभी जानते हैं कि हम विकास पथ पर ही हैं , तब फिजूल खर्ची से भर्ष्टाचार क्यों बढाया गया ?इस मसले के लिए भी सबके पास हजारों तर्क होंगे, लेकिन जब चार दिन के खेल ख़त्म होंगे तब वहां कौन खेलेगा ? अभी तो अपने पास खिलाडी भी नहीं हैं , अगर हैं भी तो उनके लिए साधन नहीं हैं , गरीब घरों कि बेटियां खेलों में हिस्सा लेती हैं क्योंकि उन्हें सुबह का नास्ता मिल जाता है और एक शहर से दूसरे शहर धूमने मिल जाता है , जब खेल चुकेंगे तब शायद कही नौकरी लग जाय ? 
सबसे बदी बात जो सामने आई है वह ये कि जो बच्चे खेलते हैं उन्हें अधिक पढने की जरूरत भी नहीं , आसानी से पास किया जाता है , तब भला कौन नहीं चाहेगा की सरकारी स्कूल में पढो और मुफ्त में खेलो , लेकिन स्कूल स्तर तक ही . खेलों का व्यापार इतना विराट हो गया है कि  हजारों लोग इसी से जीवन यापन कर रहे हैं , खेल के खेल में कला खेल भी चल रहा है , जो समय -समय पर सामने किसी कोच के रूप में सामने आता रहता है . 
क्या होगा , इन स्थानों का जहाँ करोड़ों का धन पानी सा बहा दिया गया ? जाल साजी का काम हमारे नेता -मंत्री ही कर रहे हैं , धन की उगाही करने के लिए कामनवेल्थ गेम्स का आयोजन ही करवा डाला , इन्सान बाढ़ , आंधी , आग , जलजले , भूकंप के प्रकोप से मर रहा है लेकिन राजाओं को खेल सूझ रहे हैं , कितनी खेती बर्बाद हो गई किसी को परवाह नहीं , कितना अनाज सड़ गया किसी को चिंता नहीं ,कहाँ सडकें उखड रही हैं कोई जानने वाला नहीं , फिर इन्हें क्या अधिकार है , इस तरह आयोजन करने का ? यही है महाभारत का द्युत यग्य , जब अपने पैरों पर ही पांडवों ने कुल्हाड़ी मारी थी , इतिहास दुहराया जा रहा है , समाज को गर्त में ले जाने के लिए वहां भोग -विलास का तड़का भी लगाया जायेगा , कम से कम  ये बात तो सब जानते ही हैं , लोगो से कहा जा रहा है अपने घरों के दरवाजे खुले रखें , दिलों को भी खोलकर रखें किसी को भी बिठाया जा सकता है , हद हो गई यार .....
रेनू शर्मा ..

2 comments:

वन्दना said...

यही तो रोना है……………इसी पर मैने भी लिखा था आलेख्……………मगर असर कहाँ होना है इन्होने जो करना है वो तो होकर ही रहेगा ना।

Dinesh pareek said...

बहुत सुन्दर अच्छी लगी आपकी हर पोस्ट बहुत ही स्टिक है आपकी हर पोस्ट कभी अप्प मेरे ब्लॉग पैर भी पधारिये मुझे भी आप के अनुभव के बारे में जनने का मोका देवे
दिनेश पारीक
http://vangaydinesh.blogspot.com/ ये मेरे ब्लॉग का लिंक है यहाँ से अप्प मेरे ब्लॉग पे जा सकते है