Saturday, August 27, 2011

जय हो , अन्ना बाबा की

आज बेहद ख़ुशी का दिन है , भारत की गरिमा , हमारी एकता , अखंडता , सद्भाव , भाईचारा ,और सदन की मरियादा को कैसे अक्छुन्न्य  रखा जा सकता है , यह भारतीय युवा पीढ़ी ने दिखा दिया है . लेकिन युवा ये बात कतई न भूलें कि ७४ साल के युवा का साथ यदि न होता , तो , वे कुछ भी नहीं कर सकते थे , इसलिए , यह साबित हो गया कि हमें अपने बुजुर्गों के अनुभवों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है , उनके आशीर्वाद के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता .
अन्ना बाबा !! कोई आम इन्सान नहीं हैं , वे ईश्वर के द्वारा भेजे , वो ,मसीहा हैं जो , भारतीय जन तंत्र को एक रास्ता दिखा रहे हैं, हमारी सरकार भी सोचने पर मजबूर हो गई कि शांति , अहिंसा और एकता का अलख जगाने वाला ये , अनशन करने वाला , अपने बरह्मचर्य का प्रमाण देने वाला , अपने देश प्रेम का परचम लहराने वाला , जनतंत्र को आजादी की परिभाषा बताने वाला ही है .
अन्ना बाबा !! कोटि कोटि प्रणाम !!
रेनू शर्मा 

Wednesday, April 27, 2011

बदल गया

बहुत समय से मैं , ब्लॉग से गायब हो गई थी , बजह कुछ खास नहीं , बस यूँ ही मन विरक्त सा हो गया था . आज भी वही रोना रोया जा रहा है , कहीं बलात्कार हो रहे है , कहीं लूट हो रही है , अब , एक महिला खिलाडी को रेल से फैंक दिया गया , बेचारी पैर भी गवां बैठी , लेकिन सरकार ने कह दिया - आत्म हत्या का केस है . 
लाखों करोड़ों का घोटाला  करने वाले लोग , अब जनता के सामने उल्लू बनाये जा रहे हैं क्योंकि जनता हिसाब मांगने लगी है .एक दिन था जब , बाबा के कारनामों को फर्जी कहा जा रहा था , अब जब , बेचारे समाधिस्थ हो गए  तब उनका गुणगान करते नहीं अघा रहे हैं , पूरा देश ही शोक मग्न हो गया , अभी तक कोई चर्चा भी नहीं थी . हम जाने कब सुधर पाएंगे ?
करोड़ों के राज पाट को सभांलने के लिए अब , उत्तराधिकारी खोजा जा रहा है , लेकिन एक अपाहिज लड़की के लिए सरकार के पास सुरक्षा भी नहीं है , आज सब कुछ पैसे से तौला जा रहा है , राजनीति करने वाले सभी मतभेदों को भुलाकर भाग दौड़ कर रहे हैं , एक दिन मैं करोडपति बनने का सपना देखने वाले अपहरण करने वाले बच्चों को उठा रहे हैं , नाबालिग बेटियां हवस का शिकार बने जा रहीं हैं , कुछ भी तो नहीं बदला ?
सब कुछ यथावत है . पी एम् साब !!!  अब तो एक नज़र डालिए , आपके राज्य मैं कितने लोग भूखे -नंगे हैं , अभी भी , बच्चे पन्निया बीन रहे हैं , गाड़ियाँ साफ़ कर रहे हैं , स्टेशन पर फैंका हुआ गन्दा खाना खाकर पेट भर रहे हैं , और आपका रेलवे , जहाँ से भी लाइन गुजरती है , जंगलों मैं कचरा फैंक कर सफाई अभियान को बदरंग कर रहे हैं , कभी रेल का सफ़र भी करिए .
देखिये तो सही  , कैसे रोज एक आम आदमी जीता है इस बद इन्तजामी में अब क्या कहूँ ? कुछ भी नहीं बदला .
रेनू शर्मा ... .

Monday, September 6, 2010

खेलों का खेल निराला रे भैया

युगों से खेल -कूद , कसरत , योगाभ्यास , कब्बड्डी , और न जाने क्या -क्या खेलों को तवज्जो दी जाती है , प्रतिस्पर्धाओं का चलन कोई नई बात नहीं है , इसी तरह हम अपनी संस्कृति , सभ्यता , संस्कार का आदान -प्रदान करते हैं , हमारे राष्ट्र की पहचान भी बनती है , पहले जानवरों का प्रयोग अधिक मात्र में किया जाता था , अब उनका स्थान मशीनों और उपकरणों ने ले लिया है ,
जो किसान या मजदूर सुबह से लेकर शाम तक काम करता है , वह सोचता है इन लोगों के पास कोई काम नहीं इसलिए खेलते हैं , खेलों के बहाने जानता के बल , धन और समय का नाश करते हैं , अब तो , गरीब भी समझ गया है कि सरकार जनता का ही पैसा किस तरह बहाती है , अनपढ़ भी जानता है कि यदि इस धन का उपयोग बेसिक जरूरतें पूरी करने में लगाया जाता तो कितना अच्छा होता , बच्चों को स्कूल मिल जाता , किसी को घर मिलता , अस्पताल मिल सकता था शायद भोजन भी मिल जाता . 
हम सभी जानते हैं कि हम विकास पथ पर ही हैं , तब फिजूल खर्ची से भर्ष्टाचार क्यों बढाया गया ?इस मसले के लिए भी सबके पास हजारों तर्क होंगे, लेकिन जब चार दिन के खेल ख़त्म होंगे तब वहां कौन खेलेगा ? अभी तो अपने पास खिलाडी भी नहीं हैं , अगर हैं भी तो उनके लिए साधन नहीं हैं , गरीब घरों कि बेटियां खेलों में हिस्सा लेती हैं क्योंकि उन्हें सुबह का नास्ता मिल जाता है और एक शहर से दूसरे शहर धूमने मिल जाता है , जब खेल चुकेंगे तब शायद कही नौकरी लग जाय ? 
सबसे बदी बात जो सामने आई है वह ये कि जो बच्चे खेलते हैं उन्हें अधिक पढने की जरूरत भी नहीं , आसानी से पास किया जाता है , तब भला कौन नहीं चाहेगा की सरकारी स्कूल में पढो और मुफ्त में खेलो , लेकिन स्कूल स्तर तक ही . खेलों का व्यापार इतना विराट हो गया है कि  हजारों लोग इसी से जीवन यापन कर रहे हैं , खेल के खेल में कला खेल भी चल रहा है , जो समय -समय पर सामने किसी कोच के रूप में सामने आता रहता है . 
क्या होगा , इन स्थानों का जहाँ करोड़ों का धन पानी सा बहा दिया गया ? जाल साजी का काम हमारे नेता -मंत्री ही कर रहे हैं , धन की उगाही करने के लिए कामनवेल्थ गेम्स का आयोजन ही करवा डाला , इन्सान बाढ़ , आंधी , आग , जलजले , भूकंप के प्रकोप से मर रहा है लेकिन राजाओं को खेल सूझ रहे हैं , कितनी खेती बर्बाद हो गई किसी को परवाह नहीं , कितना अनाज सड़ गया किसी को चिंता नहीं ,कहाँ सडकें उखड रही हैं कोई जानने वाला नहीं , फिर इन्हें क्या अधिकार है , इस तरह आयोजन करने का ? यही है महाभारत का द्युत यग्य , जब अपने पैरों पर ही पांडवों ने कुल्हाड़ी मारी थी , इतिहास दुहराया जा रहा है , समाज को गर्त में ले जाने के लिए वहां भोग -विलास का तड़का भी लगाया जायेगा , कम से कम  ये बात तो सब जानते ही हैं , लोगो से कहा जा रहा है अपने घरों के दरवाजे खुले रखें , दिलों को भी खोलकर रखें किसी को भी बिठाया जा सकता है , हद हो गई यार .....
रेनू शर्मा ..

छिनाल कौन ?

संवेदनाओं को खुलकर व्यक्त करने की हम सभी को आजादी है , अपनी बात हम राष्ट्र ही नहीं सम्पूरण विश्व के सामने रख सकते हैं , यहाँ स्त्री -पुरुष का कोई भेद ही नहीं है , साहित्य में पुरुष के साथ अब स्त्रियाँ भी खूब लिख रही हैं और आश्चर्य की बात है कि स्त्रियों ने भी अपने साहित्य मंडल बना लिए हैं , कहानी , कविता , लेख , व्यंग्य , क्या चाहिए सब कुछ महिला लेखिका से प्राप्त हो जाता है . कम्पूटर के माध्यम से तो लेखकों की आंधी सी आई है , हर दूसरी महिला अपनी बात सामने रख रही है .
जो कुछ भी हमारे आस -पास हो रहा है वही सब लिखा जा रहा है , महिलाएं अधिकांशत : राजनीति  से दूरी बनाकर चलतीं हैं इसलिए वहां की उदंडता वे नहीं दिखा पातीं हैं , फिर घर -परिवार और समाज की वही बातें  बचतीं हैं जो एक औरत को कचोटती हैं या परेशान करती हैं , वही लिखा जाता है , उसमें स्त्री -पुरुष के सम्बन्ध और पुरुष का बिंदासपन ही अधिक होता है .
प्रकृति के बारे में सोचना तो अब , पुरुषों ने भी छोड़ दिया है , फूलों , कलियों और लताओं की बात अब कोई नहीं करता है , बादल कब आकर बरस गए पता ही नहीं चलता है , मौसम की करवटें अब कोई नहीं महसूस कर पाता, रिश्तों की नग्नता पर लिखना अब आसान हो गया है , वहां सौन्दर्य , लालित्य , स्पर्श की अनुभूति परिपक्व होकर उजड़ चुकी है , 
साहित्य का मसाला अब , बदल गया है , जब तक , किसी कहानी या लेख में काम विषयक उत्तेजना न हो तब तक , पाठक को पढने में मजा नहीं आता और साहित्य जगत में रचना को उच्चकोटि का नहीं माना जाता , जो स्त्री जितनी आजादी से शब्दों का जाल बुनती है वही रचना पठनीय बनती है , यदि महिला साहित्यकार स्त्री -पुरुष के संबंधों पर पुरुषों के सामान अपशब्दों का प्रयोग करते हुए बिंदास लिखती है तभी वह साहित्य समाज की सदस्य बन सकती है , कहने का आशय है कि पुरुषों को यही सब चाहिए ,रचना ऐसी हो जिसे चटखारे लेकर पढ़ा जाये , लोगों के बीच जिस विषय कि चर्चा की जा सके , इसके बाद भी किसी कुलपति द्वारा लेखिका को छिनाल जैसे शब्द से संबोधित करना कितने आश्चर्य की बात है . 
अधिकांश पुरुष छिनाल शब्द का प्रयोग महिला को अपमानित और प्रताणित करने के लिए ही करते हैं , अपशब्दों से दंड देने का काम पुरुष बखूबी करता है , कोठियों के बंद दरवाजों के पीछे मर्द सिर्फ मर्द ही होता है और औरत निहायत स्त्री ही होती है , मानसिक , शारीरिक यंत्रणा भोगती वह एक बंदनी  ही होती है , पुरुष सम्पूर्ण आजादी को भोगता हुआ मित्र मंडली के बीच ठहाके लगाता हुआ किसी नारी के चरित्र पर लांछन ही लगा रहा होता है , उस पल उन्हें याद नहीं रहता कि उनके घरों में भी औरत और बेटियां हैं , उन्हें भी कोई अन्य छिनाल कह सकता है , हाँ इसका अपवाद भी हो सकता है . 
यही कुछ वजहें हैं जिसके कारण कुलपति भी एक औरत को सरेआम गाली  दे सकता है , लेकिन प्रश्न वहीँ का वहीँ है कि छिनाल कौन ?
रेनू शर्मा ... 




Saturday, July 31, 2010

महाजनों की कमी नहीं

महाजन का काम पचास बरस पहले तक , पैसे से पैसे का व्यापार हुआ करता था अर्थात धनवान महाजन गरीब लोगों को उनके ख़राब समय में पैसा उधार देता था ,बदले में ब्याज लेता था या कोई कीमती वस्तू गिरवीं रखवा लेता था जैसे मकान या जमीन के कागज अपने पास सुरक्षित रख लेता था | कारण वश व्यक्ति यदि धन नहीं चूका पाया तो समय सीमा बीतने पर महाजन गिरवीं रखी वस्तू पर अपना अधिकार पा लेता था | महाजन अर्थात बड़ा आदमी , यही बड़ा आदमी जब लक्ष्मी का दुरपयोग करता है ,तब उसकी मति भ्रष्ट हो जाती है और वह नशाखोर हो जाता है , लक्ष्मी रूपा पत्नी पर अत्याचार करता है तब {  महाजन } बन जाता है |
पुरुष   अपनी खींज , लाचारी , कायरता को स्त्री पर उडेलता है , अधिकांश पुरुष बहुरूपिये ही होते हैं , घर -परिवार के बीच उनका व्यवहार कुछ अलग होता है और अपनी मित्र मंडली में वे बिंदास होते हैं | छोटी बातों पर खीन्जना , चिड़ना , झुंझलाना उनकी आदत हो जाती है | बाहर सहन शक्ति का देवता बना रहता है, घर आकर परिवार वालों का जीना हराम करता है | धन का अभाव , नौकरी या व्यापार का न चलना इन नाकामी का श्रेय पत्नी या घर -परिवार को ही देता है | पत्नी तो हर पुरुष की नज़रों में नाकारा ही होती है | फिर कोई कैसे सोच सकता है कि ऐसा पुरुष हिंसा नहीं करेगा ? 
हम  ,महाजन की बात कर रहे हैं , उन्होंने पहली पत्नी को प्रताणित किया और तलक हो गया , अब ,दूसरी पत्नी के साथ भी वही आचार -विचार दुहराया जा रहा है , नतीजा पूरी दुनियां तमाशा देख रही है | सब लोग कहते हैं पति -पत्नी के बीच में बोलना नहीं चाहिए , पता ही नहीं चलता , क्या सही है ,क्या गलत ? जो लोग पास रहते हैं वे , समझ सकते हैं कि क्या सच है | महाजन की आदतें , व्यसन और लत तो जग जाहिर है , फिर क्या बचता है जानने के लिए ? 
एक और महाजन की बात करते हैं , वे दोस्तों की महफ़िल से आधीरात के बाद ही लौटकर आते हैं , बीते ज़माने की सखियों से फोन पर बातें बनाते हैं , वे भी , अपने पतियों से नज़रें चुराकर आशिक से इश्क लड़ा लेतीं हैं , एक दिन महाजन की पत्नी का फोन बज गया , महाजन की तो नींद गायब हो गई जबकि वह कोई रौंग नंबर था |कहने का आशय है कि पुरुष अपने हिसाब से जीता है तब तक सब ,  ठीक है , जब , पत्नी की तरफ से कुछ आहट हुई , तो तारे दिखने लगे | स्त्री को अपशब्द कहना , हिंसा करना तो पुरुष का जन्म सिद्द अधिकार है , अपने घर के लिए आदर्श बनाना , संस्कारों पर कायम रहना उन्हें नहीं आता |
एक और महाजन हैं , दोस्त उनकी जिंदगी हैं , रात को जब घर आते हैं , सब लोग सो चुके होते हैं , कभी , कमरे का फर्श उनका बिस्तर होता है ,कभी ,बाथरूम का फर्श | पत्नी कब तक , इस तमाशे को बर्दास्त करती रहे ? एक दिन स्त्री तुनक गई , घर को अस्त -व्यस्त कर दिया , पति महाशय को झकझोर दिया तब उनकी आँखें खुलीं , आखिर कब तक , सहन किया जाये ?
अब , परिवार की कुछ मरियादएं भी तो होती हैं , उनका पालन करना सिर्फ पत्नी का काम है , हमारे समाज में हजारों महाजन हैं , उनकी पत्नियाँ हिंसा का शिकार होतीं हैं , अत्याचार सह्तीं हैं , अपशब्द सुनती हैं | आजाद जिंदगी जीने का सबसे बड़ा खतरा यही है , जो हम सभी के सामने आ गया है | स्त्री , घर भी संभालती है , काम भी करती है , पैसा भी लाती है फिर भी प्रताणित  होती रहती है आखिर कब तक , चलेगा यह सब ? कब तक?
रेनू  शर्मा ....

Tuesday, June 29, 2010

गुरु पूर्णिमा पर विशेष


अज्ञानतिमिरान्धस्य  ज्ञानांजनशलाकया  |
चक्षुरुन्मीलितम येन तस्मै श्री गुरुवै नम : || 

अज्ञान रूपी अंधकार की अन्धता को ज्ञान रूपी काजल की शलाका से हमारे नेत्रों को खोलने वाले श्री गुरु को नमन है ,
हमारे देश मैं युगों से गुरु -शिष्य परंपरा परम पूज्य है , यही कारण है कि हम लोग आज भी श्रावण कि पूर्णिमा को श्री गुरु पूर्णिमा के रूप मैं मनाते आ रहे हैं , कहा जाता है  कि देवताओं के गुरु ब्रहस्पति ने इसी दिन सभी देवताओं कि प्रार्थना सुनकर परम ज्ञान दिया था , लेकिन आज हम वैज्ञानिक युग की बात कर रहे हैं , बिना गुरु ज्ञान के कुछ भी संभव नहीं है |
जब , मानव पृथ्वी पर पहली श्वांस लेता है तब , से लेकर अंतिम श्वांस तक माता ही उसकी पहली गुरु होती है , जो उसे प्यार -दुलार के साथ ही रिश्ते , सामाजिकता , नैतिकता , का ज्ञान कराती है , फिर शब्द ज्ञान , आध्यात्मिक ज्ञान , शस्त्र-शास्त्र का ज्ञान देने के लिए किसी गुरु की ही आवश्यकता पड़ती है |सम्पूर्ण पृथिवी पर असंख्य ज्ञान शालाएं है , असंख्य गुरु आचार्य हैं , जो विद्या का ज्ञान देते हैं |पुस्तकें भी हमारे जीवन मैं गुरु का स्थान रखतीं हैं | गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा - भक्ति , विश्वास आज भी देखने को मिलता है , कुछ अपवादों को छोड़कर जैसे उज्जैन मैं गुरु को तब ,तक प्रताणित किया गया जब ,तक उनकी जान ही न निकल गई , युवा राजनैतिक शिष्यों की यह गुरु के प्रति आस्था थी , और भी अनेकों उद्धरण मिल जाते हैं जब , गुरु को अपमानित होना पड़ा है अपने ही विद्ध्यार्थियों के कारण |हमारे समाज मैं अच्छाइयों के साथ ही कुछ बुराइयाँ भी हैं जिन्हें राजनेताओं के कारण ढोना पड़ता है |
इन्हीं सब अवसादों से जब , व्यक्ति मुक्ति चाहता है तब , आध्यात्मिक गुरु के पास जाता है , आध्यात्मिक गुरु हमारे आत्मिक ज्ञान का विकास करते हैं , चाहे वे प्रवचन दें , योग कराएँ या हठ योग कराएँ या कठिन प्रायश्चित कराएँ |भारत एक सर्वगुण संपन्न राष्ट्र है ,जहाँ कंदराओं मैं आज भी साधू -संत , ऋषि -मुनि धूनी लगाये विराजते हैं , गहन बर्फीली पहाड़ों की चोटियों पर नंगे बदन समाधी लगाये आज भी तपस्वी मिल जाते हैं , हजारों परम्पराओं का पालन करने वाले सम्प्रदाय आज भी सक्रीय हैं | महान हिन्दू धर्म की ज्योति को प्रकाशित करते रहते हैं |
आध्यात्म के माध्यम से शिष्यों को स्वयं से ही पहचान कराइ जाती है , ईश्वर हमारे भीतर ही है यह गुरु ही दिखा पाते हैं , हमारे आत्मिक पथ को प्रदर्शित करने का काम गुरु ही करते हैं | इस संसार चक्र से कैसे मुक्त हों या माया , मोह , ममता से कैसे मुक्ति मिले वे ही समझा पाते हैं | 
अपवाद तो हर जगह मौजूद हैं , हमें चाहिए कि जाँच -परख कर लें तभी निर्णय लें |
हमारे जीवन मैं गुरु का स्थान किसी कारण से कम नहीं हो सकता | सीखना मनुष्य की प्रकृति है , हर -पल अज्ञान को मिटाने का प्रयास करना ही चाहिए | इसी कामना के साथ गुरु पूर्णिमा पर श्री गुरु की चरण वंदना करते हुए सभी के लिए मंगल कामना करते हैं |
रेनू शर्मा ...

Saturday, June 19, 2010

कितना सार्थक अक्षरज्ञान - -

भारतीय संविधान के ८६ वें संशोधन द्वारा ६ वर्ष से १४ वर्ष तक के बालक -बालिकाओं को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त हुआ है , सरकारें जगी भी हैं लेकिन पलट कर कभी देखा नहीं , जिन गाँव , नगरों , बस्तियों में स्कूल खोले गए हैं , वहां बच्चे पढने आते भी हैं या नहीं , बच्चों के लिए पानी , बिजली , शौचालय , खेल मैदान और पुस्तकालय की सुविधा है या नहीं , मास्टर साब !! इतना जानते हैं कि माह के अंत में तनखाह कैसे मिलती है , कारण स्पष्ट है , इन स्कूलों में निम्न तबके के बच्चे पढने आते हैं , उनके माता -पिता काम पर जाते हैं , बच्चा यदि स्कूल में रहकर खाना भी खा लेता है तो उनके लिए बहुत है , क्योंकि उन्हें बच्चे के अक्षरज्ञान से कोई मतलब नहीं होता , वे अपने बच्चों को स्वय नहीं पढ़ा सकते , बच्चों को ट्यूशन देना तो और भी समस्या है , फिर सरकार कि इस मुफ्त शिक्षा का क्या औचित्य है ?
शिक्षा का चार गुना मूल्य
किसी तरह स्कूलों में प्रवेश पा लेने वाले बच्चों को सरकार द्वारा किताबें , यूर्नीफाम , खाना और सायकिल भी मिल जाती हैं , विचारणीय बात यह है कि बरस भर बीत जाने के बाद जब , परीक्षा का समय आता है तब , तक बच्चों को किताबें नहीं मिल पातीं हैं , हारकर माता -पिता को बाजारों का रुख करना पड़ता है , जहाँ लम्बी कतारें लगी रहती हैं , उनके पास इतना समय और पैसा नहीं होता कि खर्चा उठा सकें , अंततः बच्चा घर बैठ जाता है , या काम की तलाश में ढाबों पर बर्तन साफ़ करते हुए दिखाई देने लगते हैं .
एक मध्य वर्गीय परिवार की यही कहानी है , अधिकांश लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ना चाहते हैं , गली -गली में स्कूल खुले हैं उनकी मासिक फीस अधिक है फिर भी मजबूर हैं वे लोग , सरकार की योजनाओं की जानकारी भी लोगों तक नहीं पहुँच पाती , योजनाओं को गरीब लोगों तक लाने वाले लोग , पैसों की वसूली करने पर ही उन्हें योजना समझाते हैं , अब , यहाँ सरकार की गलती है या गरीब की पता नहीं .
सरकारी योजना -
सरकार ने १९८६ में शिक्षा नीति के अधीन नवोदय विद्यालय खोलने की योजना बनाई जो सार्थक सिद्ध हुई , सन १९९४ में जिला प्राथमिक शिक्षा योजना शुरू की और यूनिसेफ के सहयोग से लाखों विद्यालय खोले गए जो उपयोगी सिद्ध हुए , सरकार नहीं जानती , कहाँ विद्यालय हैं और कहाँ नहीं , अधिकांश विद्यालय धन कमाने का जरिया बन चुके हैं ,
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन -
यह नीति भी कागजी कार्यवाही बनकर रह गई , कागजों पर शुरू होकर , अफसरों से होते हुए फायलों में ही दब गई , करोड़ों की धनराशी का बन्दर बाँट हो गया , अब ,कोई यह नहीं कह सकता कि लोग पैसा खाते नहीं हैं , खाते नहीं निगलते हैं ,
मिड  -डे -मील योजना -
मिड -डे -मील योजना का लाभ माता -पिता के साथ बच्चों ने भी खूब उठाया , वो बात अलग थी कि खाने का स्तर था ही नहीं, सोचने वाली बात है कि इन योजनाओं का आशय शिक्षा से है या वोट की राजनीति से है , कुछ समझ नहीं आता . क्योंकि मील लेने के बाद बच्चों ने पढ़ा ही नहीं , भोजन के नाम पर जली हुई रोटियां , पतली दाल , कच्चे चावल यही परोसा गया , तब न बच्चा पढ़ सका और न खाना खा सका .
शिक्षा के अधिकार पर डांका-
शिक्षा का प्रचार -प्रसार इतना अधिक हो गया है कि लोगों ने शहरों में शिक्षा कि दुकाने बना ली हैं , वहां पर हजारों से लेकर लाखों तक फीस देकर ज्ञान पाया जा सकता है , माता -पिता कामकाजी हैं तब , पहली कक्षा से ही ट्यूशन चालू हो जाता है , कोचिंग का भूत तो ,बच्चों के सर चढ़कर बोल रहा है , माता -पिता की कमाई का अधिकांश हिस्सा शिक्षा पर ही खर्च हो रहा है , पूर्ण रूप से शिक्षा का व्यापारी करण हो गया है , हजारों विद्यालय , इंजीनियरिंग कॉलेज , मेडिकल कॉलेज , विश्व विद्यालय और स्कूल रोज खुलते जा रहे हैं , क्या , सरकार उस पढाई का खर्चा उठाने के लिए तैयार है ? वहां तक आकार गरीब बेंक से लोन लेकर बच्च्र को पढ़ा रहा है , खेत बेच रहे हैं , घर बेच रहे हैं , क्या , सरकार को यह सब दिखाई नहीं देता ? अमीरों का फंडा है - बच्चों को १२ वी पास करा दो , फिर माता -पिता को लूट लो ,
दूषित शिक्षा पद्यति -
गणित के सवाल हों या विज्ञानं के सूत्र सब कुछ घोलकर पिलाने का काम कोचिंग संस्थाएं करती हैं , घंटों तक बच्चे संघर्ष करते रहते हैं , उसका परिणाम यह होता है कि तनाव के शिकार बच्चे सफलता से वंचित हो जाते हैं , क्या , आज की शिक्षा का यही उद्देश्य है ? माता -पिता अपने जीवन में जो काम नहीं कर पाए , वही कार्य बच्चे से कराना चाहते हैं  , बच्चे की रूचि जाने बिना डॉक्टर , इन्जीनियर ही बनाना चाहते हैं , माता -पिता स्वयं भी तनाव ग्रस्त हो जाते हैं . सभी बच्चों को पढाई करनी है लेकिन उनकी क़ाबलियत को कोई नहीं परखता , बस भीड़ का हिस्सा बना दिया जाता है . 
मनोविकार -
असफल होने पर बच्चे मनोविकृति का शिकार हो जाते हैं , वे लोग आत्महत्या जैसे घ्रणित कदम भी उठा लेते हैं , पढाई के लिए दूसरे शहरों में रहने वाले बच्चे अकेलेपन की घुटन से तनाव में रहने लगते हैं , खाने पीने की समस्या , घर से दूरी , पढाई का दबाव , उन्हें परेशान कर देता है , कम उम्र के बच्चे भी इस मनोविकृति का शिकार होने लगे हैं , सब कुछ घटने  के बाद माता -पिता समझ पाते हैं कि उनसे कहाँ गलती हुई है .
मुफ्त शिक्षा का छलावा -
क्या , इस तरह , सरकार द्वारा चलाये जा रहे मुफ्त शिक्षा अभियान को सफलता मिल पायेगी ? हजारों स्कूलों की जरूरत है , अध्यापकों की कमी है , बच्चे कभी सरकारी तो कभी प्रायवेट स्कूल में पढने लगते हैं , सरकारी स्कूल तो सिर्फ गरीब बच्चों का ही सहारा है , वहां भी ,वे जाना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें पढना ही नहीं है , उन्हें छोटे मोटे काम करते देखा जा सकता है , काम नहीं करेंगे तो उनकी जरूरतें  कैसे पूरी होंगी ? सरकार की गरीबी उन्मूलन की योजनायें कागजों से फायलों तक सीमित रह जाती हैं , अमीर लोग और अधिक अमीर होकर रह जाते हैं , गरीब तो सड़कों पर खुलेआम सोता हुआ दिख जाता है . 
शिक्षा का व्यापारी करण चरम पर है , मुफ्त की शिक्षा , मुफ्त का खाना जाने किन लोगों को नसीब है , घर के पिछवाड़े जो मीना !! अभी तक पढने जाती थी , इस बार उसके पिता ने स्कूल नहीं जाने दिया , कोई भी , कुछ भी नहीं कर सकता क्योंकि बेटी भी पढना नहीं चाहती , उसे अंग्रेजी समझ नहीं आती , हिंदी की मात्राएँ नहीं आतीं और टीचर हर साल पास कर देती है , पढाई कठिन हो रही है , फीस बढ़ रही है तब पढने का क्या आशय ? यही हाल सभी स्कूलों का है .
अभी भी आधे से अधिक स्त्री - पुरुष निरक्षर हैं , अगर वे पढ़ भी जाते तब भी मजदूरी ही करनी पड़ती , इसलिए लगातार काम ही करते रहे , शहरों में भी हजारों बच्चे पढने नहीं जाते , माता -पिता काम पर जाते हैं , बच्चे गलियों में घुमते रहते हैं , नशे के शिकार ये बच्चे चोरी , छीना -झपटी का काम करते हैं , पुलिस यदि पकड़ भी ले तो , छूट जाते हैं , हमारे समाज में तो , पढ़े -लिखे बच्चे भी लूट -खसोट करते हैं क्योंकि उन्हें अपनी आदतों की पूर्ती के लिए धन की जरूरत होती है , 
क्या करें !!
अध्यापकों से फिजूल काम न लिया जाये ,
स्कूलों का रख -रखाव समुचित हो ,
शिक्षा को बेचने का काम बंद हो ,
जिला पंचायत को हर बच्चे की जिम्मेदारी दी जाय ,
नदियों , नालों , नहरों पर पुल बनाये जांय,
जातिगत भेदभाव मिटा दिया जाय ,
काम पर जाने वाले लोगों के लिए रात की पारी खोली जाए , जहाँ रात को  पढाई की जा सके .
स्कूलों में बेसिक जरूरतों का ध्यान रखा जाय .
रेनू शर्मा .....