Monday, November 10, 2008

सम्मोहन का खेल

भारत के कुछ राज्यों मैं बिधानसभा चुनावों का बिगुल बजते ही नेता , मंत्री , बिधायक , कार्यकर्ता , छुट भइये सब चुनाव प्रक्रिया मैं संलग्न हो गए हैं । शहर , मुहल्ले , कॉलोनी , गली और घर मैं भी चुनावों की चर्चा आम हो गई है । मैदान , पार्क , चौक - चौराहों और नुक्कडों पर भीड़ जमा कर कोई न कोई भाषण देने की अपनी खुजली शांत करता देखा जा सकता है । यह बीमारी ठीक वैसी ही है , जैसे कोई नया कवि अपनी बेसिरपैर की कविता सुनाकर तारीफ़ पाना चाहता है । ठलुए लोग , नुक्कडों पर खडे होकर पान - मसाले की पीक छिटकते दिखाई देतें हैं , और बीडी सुलगाकर दूसरे व्यक्ति से पूछते हैं की किसे टिकिट मिला या कौन आएगा भइया !! किस पार्टी का नेता क्या प्रसाद बाँट रहा है ? पूरा दिन इसी बात का सुराग लगाने मैं निकल जाता है ।
यह परम आदरणीय वोटर किसी भी उम्मीदवार की किस्मत बदल सकते हैं , बदले उन्हें चाहिए थोडी सी शराब , कुछ नोट , पैनी नज़र , तवज्जो और भाई चारा । सम्मोहन का चारा फैकते उम्मीदवार हाथ जोड़े गलियों मैं धूल फांकते मिल जाते हैं । चमचों का रेला उनके पीछे - पीछे सक्रीय कार्य - करता का तमगा हासिल करने के लिए , जय कारा लगाने के लिए , विरोधी के लिए हाय - हाय करने के लिए , किराये का टट्टू सा दौड़ता ही रहता है । आज एक के साथ तो कल किसी और के साथ , उन्हें चुनाव उत्सव से कमाई करनी होती है ।
कैसी विचित्र लीला है ? धन की नदियाँ बहाते हुए राज निति के पार उतरना चाहते हैं , कोई विरोधियों की पोल खोल रहा है , कोई काव्य ग्रन्थ का वाचन करवा रहा है , जनता पर मोहिनी शक्ति का जल बिछाया जा रहा है , साम ,दाम , दंड , भेद की नीति का पालन किया जा रहा है , दुश्मन के छक्के छुडाने के लिए भीड़ जोड़ी जा रही है ।
पल भर मैं पार्टी बदल ली जाती है , ।
दुकान दारी चल रही है , उम्मीदवारों की खरीद फरोख्त बेहिसाब चल रही है , बेरोजगार काम पर लग गए हैं लेकिन कुछ समय के लिए , राज्य की मुख्य धारा से जुड़ने का भ्रम उन्हें अवसाद मैं ले जाता है , सम्मोहन का खेल बदस्तूर जारी है , देखिये ऊंट किस करवट बैठता है ??
रेनू शर्मा ........

1 comment:

alpaansh said...

श्रधेय,आपने चुनावी बेला का बहुत अच्छा चित्रण किया है ! शव्दकोष समाप्त !