Thursday, October 23, 2008

अपराधों की पाठशाला


मानव जन्म के साथ ही अपराध का जन्म भी हुआ होगा क्योंकि मानवीय सभ्यता , संस्कृति और समाज के विकास के साथ ही अपराधों मैं भी उन्नति हुई है । अब ये बताना तो बेमानी होगा कि हमारे समाज मैं अपराधों का ग्राफ ऊँचा है या अशिक्षा का । संचार की पैनी निगाह के कारन बालक भी हर्षद और तेलगी को जानने लगे हैं । समस्या यह नहीं कि अपराधियों को नाम मिल रहा है , अपितु बात यह है कि अपराध कहाँ से पैदा हो रहे हैं , उनकी पाठशाला कहाँ है ? घोषणा कर दी जाती है कि सब शिक्षित हैं लेकिन हम जानते हैं कि बूडे तोते की तरह वे लोग सिर्फ़ अपना नाम लिखना भर जान पाते हैं । यही उनकी शिक्षा होती है ।

निरंतर विज्ञानं की बात करने वाले शहर की झुग्गी बस्तियों मैं सैकडों बच्चे स्कूल जाते ही नहीं , उन्हें पड़ने की कोई ललक नहीं , सुबह होते ही बैट- बॉल लेकर खेलने चले जाते हैं , झूंट बोलना , चोरी करना , जूआ खेलना , बी .ड़ी .सिगरेट पीना , शराब पीना और बात - बात पर झगडा करना ही वे लोग जानते हैं । पिता मजदूरी करता है , मां घर का काम करती है , रोज घहर मैं लडाई होती है , पाब दारू पीकर मां को भद्दी गालियां देता है , मारता है , घर से बच्चों को निकाल भी देता है , चार दिन बाद शकल दिखता है । उन बच्चों की शिक्षा यही है जो माता - पिता द्वारा दी जाती है ।

छोटे अपराध करना तो इनके दांये हाथ का खेल हो जाता है , सूने घरों मैं चोरी करना , दीवार फांदना , जेब काटना , नशे का सामान बेचना , नशा करना ही इनका धंधा हो जाता है , फ़िल्म देखकर वही अभिनय करना इनकी विशेषता होती है , लूट - पात करना , डकैती , बलात्कार , छेड़ - छड़ करना इनका काम बन जाता है , अपराध की इस दुनिया के बन्दों के लिए सरकार ने अब स्कूलों मैं मुफ्त मैं भोजन की व्यवस्था ही कर दी है , तबसे बालक बीएस काना खाने के लिए स्कूल जाते हैं और भाग जाते हैं , मास्टर भी तो अपना काम निबटाने गाँव की ओर चल देतें हैं , दिन भर कचरे की गठरी लिए घरों के पीछे घूमने वाले बच्चे युवा होते ही किसी उपनाम से जाने जाते हैं , जैसे दादा , गिरगिट , काका , भाई ।

सरकार तो करोड़ों की सम्पत्ती टेक्स मैं बसूलने के बाद सोचती है अब चुनाव हों तब इस धन का उपभोग किया जाए , शिक्षा के नाम पर धन का दूर पयोग ही होता है , क्या स्कूलों मैं खाना खिला कर शिक्षा दी जा सकती है ? असंभव है , भूख को मिटाया जा सकता है पर उनके दिलों मैं मानवता , सह्रदयता का ज्ञान नही जगाया जा सकता । एकता के सूत्र मैं नहीं बाँध जा सकता , अज्ञानता बढाने का ही तरीका साबित हो सकता है ।

अपराधों को कम करना है तो शहर को झुग्गी मुक्त करना होगा , हर व्यक्ति को रोजगार देना होगा , अशिक्षा को मिटाना होगा , सामान व्यवहार को लागू करना होगा । जब सरकार वोट डालने के लिए सर्वे करवा सकती है तब बेरोजगार लोगों का पता भी लगाना आसान है , शिक्षा को आवश्यक कानून के रूप मैं लागु होना चाहिए , जब आवारा पशुओं को पकड़ कर बंद किया जा सकता है तो आवारा व्यक्तियों को क्यों नहीं बंद किया जा सकता । बाल मजदूरी पर दंड का प्रावधान करना चाहिये , उनकी रूचि के अनुसार किसी काम का प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है , तभी हम पृथिवी से अज्ञान मिटा पाएंगे ।

रेनू शर्मा ...

2 comments:

makrand said...

। बाल मजदूरी पर दंड का प्रावधान करना चाहिये , उनकी रूचि के अनुसार किसी काम का प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है , तभी हम पृथिवी से अज्ञान मिटा पाएंगे ।
sahi kaha aapne
regards

alpaansh said...

200 varshon ki ladai ke baad humhen aazadi mili ..aazadi ke baad etne varson me humne jo aapne samaj me badlaav kiye hai bo kam nahi hai ..humne bahut kuch badla hai ..bahut kuch badalna hai ..hum prayaas rat hai ..chunki hamare desh me loktantrik vyabastha hai esliye humhen aachhi soch ke leadar ka intzaar karna padta hai ..koi aachhi soch wala aata hai to en prayason ko gati mil jaati hai ..aur uske jaate hi kaam band ho jaata hai ..humhara desh budhhijiviyon ke karan hi tika huaa hai jo har samasya par sab ka dhayaan kendrit karbate hai ..antotgatva ..sabkuch badalne ki shakti janta ke haanth me hai , aachhe janpratinidhi chune jo en bhalai ke kaamo ko rukne na de ..en kaamo me ruchi rakhe ..aandolan aur aabhiyano se humhara purana nata hai ..esliye aabhiyaan chalte rahiye ..ek din hum bahut kuch safal ho sakenge ..aur budhhijivi varg aalakh jagana jaari rakhen .... meri subha kamnayen hai ..