Thursday, July 31, 2008

हमारे अपने

अब मै बड़ा हो गया हूँ ,फ़िर भी कुछ बातें आज भी मेरा पीछा नही छोड़तीं ,माँ कहती थी , सुबह उठते ही ईस्वर को प्रणाम करो , अपने बुजुर्गों के चरण स्पर्श करो और अपने से छोटों को कभी परेशान मत करो । यह उपदेश
यहीं तक सीमित नहीं थे ,पुरे समाज ,शहर ,नगर, देश और फ़िर दुनिया के लिए एक ही बात मेरी माँ ,कहती थी ,सब अपने ही तो हैं , हम सब भाई - बंधू हैं ।
छुटपन से ही सोचा करता था , माँ ठीक ही तो कहती है ,पड़ोस मै रहने वाले रहीम काका कितने अच्छे हैं , मुझे देखकर मुस्कराते हैं ,एक मीठी गोली भी देतें हैं । कभी - कभी मेरे सिरपर हाथ भी घुमा देते हैं , उनकी जो बेगम हैं वे बड़ी जालिम हैं , भीतर से ही चीख - पुकार मचाती रहतीं हैं । जब अपनी गेंद लेने उनके आँगन मै जाता हूँ तो बडबढाती हैं ,क्यूँ रे ....फ़िर आ गई तेरी गेंद , ला , रुक ,आज हवा निकाल देती हूँ और मेरी ओर दौड़ पड़ती थी , वोह तो अच्छा था एक दिन उनकी सलवार उन्हीं के पैर मै उलझ गई और वे आँगन मै धडाम से गिर गईं , वरना मुझे पकड़ ही लेतीं । मैं खड़ा हंस रहा था और वे कराह रहीं थीं अन्दर से साहिबा दीदी आईं उन्हें उठा ले गईं मुझे भागने का इशारा कर दिया था । मैं पैर सर पर रख कर भाग लिया था।
हमारे आस - पास के सब लोग चाहे वे किसी भी धर्म - जाती - सम्प्रदाय के क्यों न हों , सब हमारे काका- चाचा - भाई - दीदी ही थे । कभी लगा ही नही की मैं अकेला हूँ कितना भरा - पूरा परिवार लगता था । माँ कभी मार लगाती तो चीखना शुरू कर देता शायद बगल वाली गीता दीदी सुन लें ,लेकिन जुम्मन मियां सिलाई वाले ही मुझे बचाने आते थे , अरे !! भाभी जान !!क्या बच्चे की जान लोगी ? क्यों जुल्म कर रही हो ?क्या भाई जान से झगडा हो गया ??जाने क्या - क्या बोलते जाते और अपनी दुकान पर मुझे ले जाते । साहब जादे !! अब माँ को परेशान मत करना वरना दूकान छोड़कर अब न आ पाऊंगा ।
माँ भी लापरवाह थी कभी पलट कर नही देखा की मैं कहाँ जा रहा हूँ , किसके साथ जा रहा हूँ । रिश्तों की डोर इतनी पाक और मजबूत थी की नकारात्मक सोच के लिए जगह ही नही थी ।
सब बदल रहा था , हम भी ,हमारा आस - पास भी । एक दिन पता चला की गणेश मन्दिर के पास किसी ने गाय मार दी है , आरोप - प्र्तायारोप की चीख पुलिस ठाणे तक पहुँच गई और हमारे शहर मै फसाद शुरू हो गया । मौकापरस्त लोग आपस मै झगड़ने लगे । क्या बताऊँ ? सारे रिश्ते ख़ाक हो रहे थे । एक बुजुर्ग की जान चली गई ,कई लोग घायल हो गए तब जाकर राहत मिल गई । आक्रोश का तांडव सब कुछ बदल कर रख गया , पीछ्हे रह गया पछतावा - नुकसान और अविश्वास । फ़िर सब ठीक हो गया ।
मैं संस्कारों की पट्टी पर कुछ और परत चढाना नही चाहता था ,अकस्मात् हुए हमलों से आहत जरूर था । विचारों की लड़ियाँ खोलते - बांधते मैं हवा से बातें करता ,सडक के दोनों ओर लहराते खेतों ,बागों ,जंगलों को निहारता सरपट गाड़ी चला रहा था की यकायक ब्रेक पर पैर चला गया , मन चाह रहा था ,एक कप चाय का सेवन किया जाय ,मेरे दोस्त ने भी स्वीकारोक्ति दी और हम दुकानों के सामने च हल कदमी करने लगे । पान की दुकान पर कुछ लोग झुंड मै बैठे कुछ मंत्रणा कर रहे थे ,मुझे अच्छा नही लगा या कहूं कीउन्हें देखकर मेरे भाव ही बदल गए , एक नफरत का भाव मेरे चारो ओर खीच गया , अपनी नज़र वहाँ से हटा कर दूर करना ही चाहता था की दूकान के अन्दर लिखे पोस्टर पर आँखें रुक गईं -लिखा था ----"मेरा भारत महान " " हिंदू मुस्लिम भाई - भाई " एक ओर तिरंगा चिपका हुआ था । मैं जहाँ खडा था ,खडा रह गया , अपनी सोच पर कोफ्त हो रही थी की मैं इतना ग़लत कैसे सोच गया , क्या हुआ था पल भर मै ? मैं रेंगता सा दुकान पर गया पान लेकर वापस आ गया ।
दोस्त से अपनी गिरह खोल रहा था की मैं क्यों एसा सोच गया ? हमारी सोच और भावनाओं की तीछन कतारों का कोई तो हल होगा ? रिश्तों को भूल कर हम क्यों वर्ग - विशेष पर चर्चा करतें हैं ,उन्हें दोष देते हैं ? हम देर तक सामाजिक गतिबिधियों पर चर्चा करते रहे और वीरान रास्तों के पार मंजिल तक जाने का प्रयास करते रहे । अभी शहर की देहरी लाँघ ही रहे थे की पता चला हमारे शहर मै पाँच जगह बोम्ब ब्लास्ट हुए हैं , सब ओर अफरा - तफरी मची है । हम लोगों की मदद के लिए दौड़ गए ।
रेनू शर्मा ३१ .७ .००८.

2 comments:

alpaansh said...

ramayan aur kuran ke saath "hamare aapne "ka ye paath anibarya roop se bharat wasiyon ko padane ki aavshyakta hai ..kuch log nafrat felakar humhen humhari sanskrati se door karne ka prayas kar rahe hai ...ye paath humhen hamesa anekta me ekta wali bhartiye sanskrati ko hamare dilon me jivit rakhne me sahayak hoga ..aap yakinan kalam ki dhani hai , mera naman suwikaar karen

No Mad Explorer.... said...

Veru gud read...indeed...Chachiji...Ajay..