Saturday, June 19, 2010

कितना सार्थक अक्षरज्ञान - -

भारतीय संविधान के ८६ वें संशोधन द्वारा ६ वर्ष से १४ वर्ष तक के बालक -बालिकाओं को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त हुआ है , सरकारें जगी भी हैं लेकिन पलट कर कभी देखा नहीं , जिन गाँव , नगरों , बस्तियों में स्कूल खोले गए हैं , वहां बच्चे पढने आते भी हैं या नहीं , बच्चों के लिए पानी , बिजली , शौचालय , खेल मैदान और पुस्तकालय की सुविधा है या नहीं , मास्टर साब !! इतना जानते हैं कि माह के अंत में तनखाह कैसे मिलती है , कारण स्पष्ट है , इन स्कूलों में निम्न तबके के बच्चे पढने आते हैं , उनके माता -पिता काम पर जाते हैं , बच्चा यदि स्कूल में रहकर खाना भी खा लेता है तो उनके लिए बहुत है , क्योंकि उन्हें बच्चे के अक्षरज्ञान से कोई मतलब नहीं होता , वे अपने बच्चों को स्वय नहीं पढ़ा सकते , बच्चों को ट्यूशन देना तो और भी समस्या है , फिर सरकार कि इस मुफ्त शिक्षा का क्या औचित्य है ?
शिक्षा का चार गुना मूल्य
किसी तरह स्कूलों में प्रवेश पा लेने वाले बच्चों को सरकार द्वारा किताबें , यूर्नीफाम , खाना और सायकिल भी मिल जाती हैं , विचारणीय बात यह है कि बरस भर बीत जाने के बाद जब , परीक्षा का समय आता है तब , तक बच्चों को किताबें नहीं मिल पातीं हैं , हारकर माता -पिता को बाजारों का रुख करना पड़ता है , जहाँ लम्बी कतारें लगी रहती हैं , उनके पास इतना समय और पैसा नहीं होता कि खर्चा उठा सकें , अंततः बच्चा घर बैठ जाता है , या काम की तलाश में ढाबों पर बर्तन साफ़ करते हुए दिखाई देने लगते हैं .
एक मध्य वर्गीय परिवार की यही कहानी है , अधिकांश लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ना चाहते हैं , गली -गली में स्कूल खुले हैं उनकी मासिक फीस अधिक है फिर भी मजबूर हैं वे लोग , सरकार की योजनाओं की जानकारी भी लोगों तक नहीं पहुँच पाती , योजनाओं को गरीब लोगों तक लाने वाले लोग , पैसों की वसूली करने पर ही उन्हें योजना समझाते हैं , अब , यहाँ सरकार की गलती है या गरीब की पता नहीं .
सरकारी योजना -
सरकार ने १९८६ में शिक्षा नीति के अधीन नवोदय विद्यालय खोलने की योजना बनाई जो सार्थक सिद्ध हुई , सन १९९४ में जिला प्राथमिक शिक्षा योजना शुरू की और यूनिसेफ के सहयोग से लाखों विद्यालय खोले गए जो उपयोगी सिद्ध हुए , सरकार नहीं जानती , कहाँ विद्यालय हैं और कहाँ नहीं , अधिकांश विद्यालय धन कमाने का जरिया बन चुके हैं ,
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन -
यह नीति भी कागजी कार्यवाही बनकर रह गई , कागजों पर शुरू होकर , अफसरों से होते हुए फायलों में ही दब गई , करोड़ों की धनराशी का बन्दर बाँट हो गया , अब ,कोई यह नहीं कह सकता कि लोग पैसा खाते नहीं हैं , खाते नहीं निगलते हैं ,
मिड  -डे -मील योजना -
मिड -डे -मील योजना का लाभ माता -पिता के साथ बच्चों ने भी खूब उठाया , वो बात अलग थी कि खाने का स्तर था ही नहीं, सोचने वाली बात है कि इन योजनाओं का आशय शिक्षा से है या वोट की राजनीति से है , कुछ समझ नहीं आता . क्योंकि मील लेने के बाद बच्चों ने पढ़ा ही नहीं , भोजन के नाम पर जली हुई रोटियां , पतली दाल , कच्चे चावल यही परोसा गया , तब न बच्चा पढ़ सका और न खाना खा सका .
शिक्षा के अधिकार पर डांका-
शिक्षा का प्रचार -प्रसार इतना अधिक हो गया है कि लोगों ने शहरों में शिक्षा कि दुकाने बना ली हैं , वहां पर हजारों से लेकर लाखों तक फीस देकर ज्ञान पाया जा सकता है , माता -पिता कामकाजी हैं तब , पहली कक्षा से ही ट्यूशन चालू हो जाता है , कोचिंग का भूत तो ,बच्चों के सर चढ़कर बोल रहा है , माता -पिता की कमाई का अधिकांश हिस्सा शिक्षा पर ही खर्च हो रहा है , पूर्ण रूप से शिक्षा का व्यापारी करण हो गया है , हजारों विद्यालय , इंजीनियरिंग कॉलेज , मेडिकल कॉलेज , विश्व विद्यालय और स्कूल रोज खुलते जा रहे हैं , क्या , सरकार उस पढाई का खर्चा उठाने के लिए तैयार है ? वहां तक आकार गरीब बेंक से लोन लेकर बच्च्र को पढ़ा रहा है , खेत बेच रहे हैं , घर बेच रहे हैं , क्या , सरकार को यह सब दिखाई नहीं देता ? अमीरों का फंडा है - बच्चों को १२ वी पास करा दो , फिर माता -पिता को लूट लो ,
दूषित शिक्षा पद्यति -
गणित के सवाल हों या विज्ञानं के सूत्र सब कुछ घोलकर पिलाने का काम कोचिंग संस्थाएं करती हैं , घंटों तक बच्चे संघर्ष करते रहते हैं , उसका परिणाम यह होता है कि तनाव के शिकार बच्चे सफलता से वंचित हो जाते हैं , क्या , आज की शिक्षा का यही उद्देश्य है ? माता -पिता अपने जीवन में जो काम नहीं कर पाए , वही कार्य बच्चे से कराना चाहते हैं  , बच्चे की रूचि जाने बिना डॉक्टर , इन्जीनियर ही बनाना चाहते हैं , माता -पिता स्वयं भी तनाव ग्रस्त हो जाते हैं . सभी बच्चों को पढाई करनी है लेकिन उनकी क़ाबलियत को कोई नहीं परखता , बस भीड़ का हिस्सा बना दिया जाता है . 
मनोविकार -
असफल होने पर बच्चे मनोविकृति का शिकार हो जाते हैं , वे लोग आत्महत्या जैसे घ्रणित कदम भी उठा लेते हैं , पढाई के लिए दूसरे शहरों में रहने वाले बच्चे अकेलेपन की घुटन से तनाव में रहने लगते हैं , खाने पीने की समस्या , घर से दूरी , पढाई का दबाव , उन्हें परेशान कर देता है , कम उम्र के बच्चे भी इस मनोविकृति का शिकार होने लगे हैं , सब कुछ घटने  के बाद माता -पिता समझ पाते हैं कि उनसे कहाँ गलती हुई है .
मुफ्त शिक्षा का छलावा -
क्या , इस तरह , सरकार द्वारा चलाये जा रहे मुफ्त शिक्षा अभियान को सफलता मिल पायेगी ? हजारों स्कूलों की जरूरत है , अध्यापकों की कमी है , बच्चे कभी सरकारी तो कभी प्रायवेट स्कूल में पढने लगते हैं , सरकारी स्कूल तो सिर्फ गरीब बच्चों का ही सहारा है , वहां भी ,वे जाना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें पढना ही नहीं है , उन्हें छोटे मोटे काम करते देखा जा सकता है , काम नहीं करेंगे तो उनकी जरूरतें  कैसे पूरी होंगी ? सरकार की गरीबी उन्मूलन की योजनायें कागजों से फायलों तक सीमित रह जाती हैं , अमीर लोग और अधिक अमीर होकर रह जाते हैं , गरीब तो सड़कों पर खुलेआम सोता हुआ दिख जाता है . 
शिक्षा का व्यापारी करण चरम पर है , मुफ्त की शिक्षा , मुफ्त का खाना जाने किन लोगों को नसीब है , घर के पिछवाड़े जो मीना !! अभी तक पढने जाती थी , इस बार उसके पिता ने स्कूल नहीं जाने दिया , कोई भी , कुछ भी नहीं कर सकता क्योंकि बेटी भी पढना नहीं चाहती , उसे अंग्रेजी समझ नहीं आती , हिंदी की मात्राएँ नहीं आतीं और टीचर हर साल पास कर देती है , पढाई कठिन हो रही है , फीस बढ़ रही है तब पढने का क्या आशय ? यही हाल सभी स्कूलों का है .
अभी भी आधे से अधिक स्त्री - पुरुष निरक्षर हैं , अगर वे पढ़ भी जाते तब भी मजदूरी ही करनी पड़ती , इसलिए लगातार काम ही करते रहे , शहरों में भी हजारों बच्चे पढने नहीं जाते , माता -पिता काम पर जाते हैं , बच्चे गलियों में घुमते रहते हैं , नशे के शिकार ये बच्चे चोरी , छीना -झपटी का काम करते हैं , पुलिस यदि पकड़ भी ले तो , छूट जाते हैं , हमारे समाज में तो , पढ़े -लिखे बच्चे भी लूट -खसोट करते हैं क्योंकि उन्हें अपनी आदतों की पूर्ती के लिए धन की जरूरत होती है , 
क्या करें !!
अध्यापकों से फिजूल काम न लिया जाये ,
स्कूलों का रख -रखाव समुचित हो ,
शिक्षा को बेचने का काम बंद हो ,
जिला पंचायत को हर बच्चे की जिम्मेदारी दी जाय ,
नदियों , नालों , नहरों पर पुल बनाये जांय,
जातिगत भेदभाव मिटा दिया जाय ,
काम पर जाने वाले लोगों के लिए रात की पारी खोली जाए , जहाँ रात को  पढाई की जा सके .
स्कूलों में बेसिक जरूरतों का ध्यान रखा जाय .
रेनू शर्मा .....

2 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत ही उपयोगी सुझाव, यदि इन्हें अपनाया जाए तो साक्षरता को निश्चित रूप से बढावा मिलेगा।
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इंसानों से बेहतर चिम्पांजी?
क्या आप इन्हें पहचानते हैं?

माधव said...

nice