Sunday, September 13, 2009

दर्द

संसार चक्र की नियति है , इंसान जन्म लेता है , किशोर ,युवा , प्रोण और फ़िर वृद्ध हो कभी शतायु हो , कभी अल्पायु हो इस जीवन भ्रम को जीता हुआ मुक्त हो जाता है और कभी फ़िर से इस पृथ्वी लोक में जन्म ले भवसागर पार करने का प्रयास करता है ।
हम सभी लोग युवा होते -होते समझने लगते हैं कि जीवन अमूल्य है , शरीर एक साधन है , आत्मा एक दिव्य उर्जा का अंश है जो , हम सब में संचरण करती है । एक दिन यही उर्जा शरीर को छोड़कर चल पड़ती है , जब हमारा शरीर या तो , जराग्रस्त हो जाता है या घायल जाय या और भी कई कारण हो सकते हैं ।
हम जानते हैं कि एक दिन सबके साथ यही घटित होने वाला है । मानवीय घात की घटना होने पर हम हम दुखी होते हैं , कुछ संवेदनात्मक चर्चा करने के बाद भूल भी जाते हैं । हमारा कोई अजीज मरता है तब , पूरा श्री मद भगवद गीता समझ आता है । शमशान को करीब से देखना , वहां के क्रिया -कलाप हमें पीड़ित करते हैं । उसे भी भूल जाते हैं । फ़िर रम जाते हैं इस माया जाल में ।
माता -पिता चाहे किसी भी योनी के हों , बच्चों के लिए जान भी देने के लिए तत्पर रहते हैं । उनके सुनहरे भविष्य के लिए अपना आज कुर्वानकर देते हैं । हाँ , कुछ लोग कहेंगे कि इसमें माता -पिता का स्वार्थ भी छुपा है , अपना वंश चलाने के लिए उन्हें ही संतान की जरूरत थी , जो भी हो , सच तो यही है , माता -पिता कोई कसर नही छोड़ते ।
सीनियर सिटिजन हेल्प लाइन नम्बर पर सबसे पहले कॉल करने वाले युवा लोग ही निकले जो , अपने बुजुर्गों को आश्रम में छोड़ना चाहते थे । उनसे मुक्ति चाहते थे । माता -पिता पर क्या बीतती होगी जो ऐसे बच्चों के साथ रहने को मजबूर हैं । उनकी हसरतें , जवानी , खुशियाँ , सपने , धन ,सब कुछ लूटने के बाद अब ,आजाद करना चाहते हैं । हाँ , वे भी अब , किसी काम के नही रहे , बिस्तर में पड़े खांसते होंगे , थूकते होंगे , बार -बार टॉयलेट जाते होंगे , खाना भी मांगते होंगे, हो सकता है दवा भी लानी पड़ती होगी ।
हमारे युवाओं को वृद्धावस्था गंवारा नही है । हम आत्मा और उर्जा की बात इसीलिए कर रहे थे क्योंकि कहा जाता है कि पुत्र पिता की आत्मा ही होता है । वैज्ञानिक युग की इस सभ्यता के पास अपने जन्म दाता के लिए जगह नही है । संतान पैदा करने के लिए भी समय नही है , धन का संग्रह करना ही मुख्य ध्येय है । वे , लोग अभी सोच नही पाते, जब वे वृद्ध होंगे, तब क्या होगा ? नितांत एकाकी और तन्हां तो अभी से हैं फ़िर रिटायर होने के बाद क्या होगा ?
हमारा समाज पतन की ओर ही जा रहा है , जीवन के आवागमन को जानते हुए भी संवेदनहीन हो रहे हैं । कभी बचपन की कोई बात याद नही करते जब , पिता ने फटे पर्स से भी पचास का नोट निकाल कर दिया होगा , माँ ने रात में जागकर चाय बनाकर दी होगी , कितनी बार पापा की मार से बचाया होगा । हम चाहते हैं किसी हेल्प लाइन की जरूरत कभी न पड़े ।
इतिहास स्वयं को दुहराता है इसलिए ध्यान रहे- माता -पिता के साथ किया गया कर्म तुम्हारे साथ भी घटित हो सकता है । इस दर्द को बढ़ने मत दो । बांहें फैला दो बुजुर्ग माता -पिता के लिए और उन्हें सम्मान के साथ जीवन जीने दो ।
रेनू ....
सत्य घटना पर आधारित दर्द का एक अंश मात्र

5 comments:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

आपको हिन्दी में लिखता देख गर्वित हूँ.

भाषा की सेवा एवं उसके प्रसार के लिये आपके योगदान हेतु आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ.

Mithilesh dubey said...

वाह बहुत खुब। सच्चाई को उकेरति लाजवाब रचना।

वाणी गीत said...

मार्मिक प्रस्तुति ..!!

Atmaram Sharma said...

बहुत अच्छा लगा पढ़ते हुए.

दिगम्बर नासवा said...

मार्मिक ....... सत्य लिखा है ...... युवा वर्क को इस बात का ख़ास ख्याल रखना होगा ....... समझना होगा वो भी बुढापे की तरफ कदम बड़ा रहे हैं ........