Saturday, February 21, 2009

पतंग


स्कूल में रंगों से परिचय करते समय कई बार पतंग बनाकर रंग भरने पड़े थे , तब पतंग का भावार्थ समझ नही आता था । बस समझ आता था , पतंग एक धागे के सहारे नीले आकाश में ऊँची उड़ती चली जाती है फ़िर कट जाए तो , कभी पकड़ नही आती । पतंग लूटने वाले उसके इतने दीवाने हो जाते हैं कि नाजुक कागज की पतंग को तार तार कर मिटटी में मिला देते हैं । जब उड़ती है तब आजाद उड़ती है , कोई टोका -टाकी नही । अब समझ आता है कि नवयोवना का जीवन भी पतंग से कम नही होता । मंझे को साधने वाला पुरूष करतब दिखाता हुआ, जहाँ चाहे दूसरी पतंग से अपनी डोर अटका देता है और अपनी डोर दूसरे से कटवा कर , दूसरी पतंग लूट भी लेता है । कहता है , मैं पेंच लड़ा रहा हूँ ।

विवाह पूर्व युवती पिता व भाई के संरक्षण में रहती है , वहां काटने का भय नही रहता क्योंकि भारतीय संस्कृति में पोषित जीवन विवाहोपरांत ही शुरू हुआ मन जाता है । अधिकांश पुरूष बेटियों को अनमोल धरोहर की तरह सहेजकर रखते हैं जैसे पतंग सहजता से रखी जाती है । फ़िर पतंग को ऊंचाई देने , हवा से बातें करने के लिए एक नया सफर शुरू होता है । पेंच लड़ते हुए , कटना है और जाने किस गली में लुट जाना है । कुछ भी हो सकता है , किसी ऊँचे पेड की टहनी में अटक कर रह जाए , किसी बहुमंजिले भवन में सजे हुए फ्लैट की तरह ।

बिजली के तारो के बीच झूलती रहे जहाँ से न कोई लूट सके न बचा सके । दहेज़ के लालची पति के बीच फंसी युवती की तरह । जीवन भर पति अपनी पत्नियों को लूटते ही तो रहते हैं , भ्रम का जाल फैलाकर उसे नि : शब्द कर देतें हैं , उसकी खामोशी पर गर्भित हो अभिमानी बन बैठते हैं , ठीक उसी तरह जैसे आकाश में ऊँची उड़ती पतंग शांत , खामोश उड़ती रहती है , उडाने वाले को निश्चिन्तता का भान कराती है लेकिन दूसरे ही पल डगमगा जाती है , बहती जाती है नीचे की ओर किसी नदी सी ।

कच्चे धागे से पहले थोड़ा पक्का मंजा पतंग में जोड़ा जाता है , उसकी मजबूती को बनाये रखने के लिए जैसे विवाह बंधन की दृढ़ता के लिए रस्में औरपवित्र मन्त्र मजबूती प्रदान करते हैं । धीरे -धीरे कच्चे धागे से बंधी जन्दगी डगमगाती रहती है । हर बार टूटने का भ्रम होता है । कटी पतंग सी स्त्री भयग्रस्त ही रहती है । जाने किस मोड़ पर , किस घड़ी उसे लुटा हुआ छोड़ दिया जाए , जाने कब रक्षा कवच बना कच्चा धागे सा पुरूष अपना नाता तोड़ ले ।

आज पतंग और स्त्री का सामीप्य समझ आने लगा है । दोनो का सूत्रधार पुरूष ही है । जाने कब वह समय होगा जब नारी आजाद पंछी सी, नील गगन में , कंडील सी चमकते हुए कुछ पल जी पायेगी ।

रेनू .....

2 comments:

अनिल कान्त : said...

बहुत ही जानदार लेख ....आपने बहुत सशक्त लेखन का परिचय दिया है

अक्षत विचार said...

स्त्रियों की पतंग से तुलना पर मैं सहमत नहीं हूं