Thursday, January 29, 2009

ठलुए पहरेदार


सदियों से कथा ,कहानियो में पढ़ते आ रहे हैं ,हीर -राँझा , सोहनी -महिवाल , जोधा -अकबर और न जाने कितनी हीर , कितने राँझा पनपते हैं और इस समाज की नियमावली के नीचे दफ़न हो जाते हैं । चौदह तारिख को दुनिया भर के लोग वैलेंटाइन डे मनाते हैं । अब इस कहानी को तो सभी जानते हैं । हम सभी जानते हैं कि प्यार , मुहोब्बत , दोस्ती से ही इस पृथ्वी पर जीवन जीया जा सकता है , अगर हम रंग -भेद , जाति , मजहब , वर्ण को बीच में लाकर तमाशा खड़ा करेंगे तब हमारी वसुधैव -कुटुम्बकं की माला खंडित ही हो जायेगी ।

कुछ समाज और संघ के लोग समाज को पाश्चात्यीकरण से मुक्त करने के लिए सड़कों , बाग़ -बगीचों , होटलों आदि में मजनुओं या प्रेमी जोडों को अपमानित करते हैं और मारपीट करते हैं , तो क्या , इस सख्ती से अभी तक कुछ कर पाये ? आख़िर क्यों ? इस तरह की दादागिरी की छूट राज्य सरकार उन्हें देतीं हैं । दल बनाकर जो लोग सड़कों पर फसाद फैलाते हैं , क्या कभी उन्होंने अपने घरों की गंदगी को साफ़ किया है ।

वे लोग स्वयं कितने पाक साफ़ हैं इसके क्या सबूत हैं । हमारे समाज में कुछ लोग इस हद तक पगला जाते हैं कि धर्म और समाज में उनकी नाक न कटे इसके लिए प्रेमी युगल को सरेआम कत्ल करने से भी नही हिचकते । फ़िर चाहे जीवन भर सलाखों के पीछे ही जिन्दगी गुजारनी पड़े ।

हमारा फिल्मी जगत भी इन सब स्तिथियों के लिए प्रेरणा का काम करता है । कोई भी फ़िल्म बिना प्रेम कहानी के सफल ही नही होती है । प्रेमी चीख -चीख कर गाना गाता है ... हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नही जानते ...मगर जी नही सकते तुम्हारे बिना ....अनारकली मैम तो गा उठती हैं ....प्यार किया कोई चोरी नही की ....प्यार में आहें भरना क्या ? जब प्यार किया तो डरना क्या .....हजारों गाने हैं जो प्रेमी दिलों को ताजगी प्रदान करते हैं । प्रेमी ही क्यों साधारण गृहस्थ भी अपनी बात कहने के लिए इन गीतों का सहारा लेतें हैं । कभी जब पत्नी रूठ जाती है , तब पति महाशय बड़े ही अदब से गा उठते हैं ...ये मेरी जोहरा जावं तुझे मालूम नही , तू अभी तक है हसीं और मैं जवां ....तुझपे कुर्वान मेरी जान ...मेरी जान .....जाने कितने बुजुर्ग भी इस गीत के कद्रदान हैं , कितनी बार उनकी प्रेमिका इन पंकियों को सुन कर उनकी बांहों में झूल गईं होंगी ।

कहने का आशय है कि जीवन की बेसिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं से मुंह मोड़कर संस्कार पैदा नही किए जा सकते । जब हम अपने बच्चों को दूसरे देशों में शिक्षा प्राप्ति के लिए भेजते हैं , तब चिंता नही होती कि वहाँ बच्चा क्या करेगा ? क्या नहीं । सिर्फ़ हमारी सरजमीं पर सात्विक बना रहे जबकि असलियत यह है कि आज का युवा अधिक संस्कारवान है वनस्पत सठियाये लोगों के ।

मर्यादा का उल्लंघन करने वाला दण्डित होना चाहिए , इसका आशय यह नही कि आप सरेआम भारतीय गलियों में उत्पात मचाते फिरें । रूढियों को बदलना होगा , बदलाव को स्वीकारना भी होगा । हम यदि अपने घर की पाठशाला में नैतिक मूल्यों पर चर्चा करते रहें तो , नींव की मजबूती पर पूर्ण विश्वास कर सकते हैं ।

थोड़ा सा प्यार , थोडी सी फटकार , थोडी सी बंदिश , थोडी सी आजादी , थोडी सी पहरेदारी , थोड़ा विश्वास , ढेर सरे अपनेपन के लिए काफ़ी है , इसलिए ठलुए पहरेदारों को समझ जाना चाहिए कि क्या ठीक है , क्या ठीक नही है ।

रेनू ......

5 comments:

विनय said...

बिल्कुल सही बात समझायी है आपने!

PN Subramanian said...

बहुत ही सुंदर लिखा है लेकिन जिनको समझना है वे या तो इसे पढेंगे ही नहीं अथवा समझने से ही इनकार कर देंगे. फ़िर क्या करें. सिर्फ़ आशा के सहारे कि "वो सुबह कभी तो आएगी". आभार.

varsha said...

bilkul sahi...hamaare desh mein har gunaah ke liye kaanoon mein sazaa hai aur jiske liye nahi hai wo gunaah nahi hai..

परमजीत बाली said...

सामयिक पोस्ट प्रेषित की है।बधाई।

अनिल कान्त : said...

अब ठलुए भी तो इसी बहाने अपने को प्रसिद्द करना चाहते हैं ...इसी लिए वो बहाना बनाकर ये सब करते हैं ... अच्छा लेख

अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति