Thursday, August 14, 2008

स्वतंत्रता की व्यथा

पहली स्वतंत्रता - "" कहीं भी चक्का जाम करो , सड़कों ,गलियों ,चोराहों को मानवीय हुज्जूम से खचाखच भर दो । ""
२ - "" किसी भी निरीह को पकडो , डंडे बरसा दो , उसे बता दो कि संटी क्या होती है । """
३ - "" डॉक्टर , बैद्य ,हकीम, मास्टर , गुरु , ज्ञानी जो भी लगा कर दो , तोड़ दो ,फोड़ दो , कुछ कहे तो आग लगा दो । ""
४ - "" किसी बन्दे को आगे मत बदने दो , बच्चों का सा मन पैदा करो - न खेलो , न खेलने दो ।
५ - "" किसी भी लक्ष्मी दास के खजाने पर नज़र लगा कर रखो , मौका मिलते ही अपहरण कर लो ।
६ - "" अठन्नी -चवन्नी कमाने मै यदि मुश्किल आ रही है तो स्त्रियोचित शील भंग कर हाट - बाजार लगा लो ।
७ - "" अगर कुछ न बने तो लूट शुरू कर दो ।
आख़िर कब तक स्वतंत्रता के गुन गान करती रहूंगी ? युवा वर्ग इस को आजादी समझता है । जहाँ उच्स्र्न्ख्लता हो , निष्ठुरता हो ,बहशीपन हो ,नशा हो , वहाँ अमरबेल सा आतंक अपनी जड़ें जमा रहा है । इन्सान भटक रहा है ।
स्वतंत्र ता का आशय तो , मन , मष्तिष्क , आत्मा और शरीर की स्वतंत्रता है . हम पूरे विश्व को बता पायें कि बुराइयों को जीत कर ही हम ऊँचाइयाँ छू सकतें हैं ।
रेनू शर्मा

1 comment:

आशीष said...

बिल्कुल सटीक लिखा है आपने..