Saturday, May 1, 2010

कैसे होती है गुप्तचरी !!

हमारे धर्मग्रन्थों से लेकर सम्पूर्ण पृथ्वी का साहित्य गुप्तचरों के कारनामों की रोचक कहानियों से भरा हुआ है . हम अक्सर पढ़ते रहते हैं कि व्यक्ति ने देश के साथ गद्दारी की , फलां व्यक्ति गुप्चारी करते पकड़ा गया  या पकड़ी गई ,
यह कोई आज की बात नहीं है , देवताओं के दूत नारद जी से लेकर माताहारी हो या देवकीनंदन खत्री का उपन्यास चंद्रकांता या फिर अदनी सी पुलिसिया कर्मचारी माधुरी हो . बच्चों के जहाँ में कई बार यह सवाल पैदा होता है कि आखिर ये गुप्तचरी  क्या होती है ? और कैसे होती है ? हमारे देश की गुप्तचर संस्था को कैसे पता चलता है कि आतंकी या अपराधी हमारे देश की सीमाओं में घुस गए हैं ?  
सबसे पहले छोटे रूप में , अपने घरों से ही इस बात को समझने का प्रयास करते हैं , कुछ समय पहले पता चला कि दुवे जी की बेटी की शादी किसी रघुबीर से हो रही है जो उसके कॉलेज में ही पढता था , बात की तह तक जाने के लिए पहले तो , उनके घर में काम करने वाली बाई का सहारा लिया गया , जब कोई खास खबर हाथ नहीं लगी तब , श्री मतिवर्मा  का पता चला कि वे दुवे जी के घर आती जातीं हैं , हमारा जासूस वर्मा जी के पास पहुँच गया , वार्तालाप के बीच उन्हें पता लगाना होगा कि रघुबीर कौन है ? वर्मा जी , शीघ्र ही दुवे जी के घर चली गईं और मिठाई मांगते हुए सारी जानकारी जुटा ली गई , लौटते ही सारी जानकारी हमारे पास थी . 
ऐसी गुप्तचरी , हम लोग अपने घरों में करते हैं , छोटी -छोटी जानकारी जो अपने बच्चों से नहीं मिल पाती ,उनके दोस्तों से बात करते हुए मिल जाती है , जैसे , कब कौन सी पिक्चर देखी , कब , कॉलेज से बैंक मारा आदि 
यही क्रम हमारे आस -पास फैला हुआ है , शहर से लेकर देश और फिर पूरी पृथ्वी तक यही सिलसिला चलता रहता है , 
अपराधी लोगों का साथ अधिकतर अपराधियों से ही होता है , इसलिए उन्हीं से सभी जानकारी जुटाई जाती है , यही बात नशेड़ियों पर लागु होती है , उन्हें पता होता है कि शहर में दारू के अड्डे कहाँ कहाँ हैं , इसी तरह जुआरियों को पता रहता है , कहाँ खेल चल रहा होगा , बस चेतन्य रहने की बात है 
क्या  ,किसी पुलिस अधिकारी को पता नहीं रहता कि उसके शहर में क्या चल रहा है ?हर गली , मोहल्ले की जानकारी उन्हें रहती है , कब चोर अंकल भ्रमण पर निकल रहे हैं , कब वारदात हो सकती है , उन्हें सब अनुमान रहता है लेकिन जब , जिंदगी की जरूरतें , जरूरत से जादा दस्तक देने लगें तब , मार्ग से विचलित व्यक्ति यही हरामखोरी करता है . 
परिणाम यह होता है कि हमारा देश ही मुसीबत में घिर जाता है , वो , तो भला हो ईश्वर का जो , दृष्टि सीधी रहती है तो , गुनाहगार देर सबेर पकड़ जाता है और इंसानों का भला होता है , 
गुप्चरी विद्धया मानवों के साथ ही साथ कीट पतंगों , जानवरों , सभी के काम आती है . चाहे चींटियाँ हों , मधुमक्खियाँ हों या पंछी . 
तो है आसान , गुप्चरी . 
रेनू शर्मा ...

2 comments:

दीर्घतमा said...

guptchari ke bare me ek acchha lekh.
bichar bahut thik hai .
acchha laga.Kathpuatali
dhanyabad

RAJNISH PARIHAR said...

गुप्तचरी के बारे में बढ़िया बताया...लेकिन आजकल सब कुछ हाईटेक हो गया है,जिस पर पूरा लेख लिखा जा सकता है...