Friday, March 5, 2010

लो , बीत गया , दहशत का साल

हर बार नव वर्ष आता है , दुनियां भर के मानव खुशियाँ मनाते हैं . नए साल के डूबते सूरज का सम्मान कराते हुए , उगते हुए भास्कर का अभिनन्दन अपने -अपने तरीके से सभी कर लेते हैं . बीते बरस की गई गलतियों से शायद तौबा भी करते हैं , भविष्य की सुनहरी योजनाओं की लिस्ट खुलने लगती है . 
जब बीते बरस जनवरी आई थी तब , सोचा था ,यह नहीं होगा , यह होगा , लेकिन जो नहीं सोचा था , वही हुआ . दिन , महीने सब बीतते गए ,कहीं ब्लास्ट हुआ, कहीं बरफ खिसक गई , कहीं आतंकियों ने घरों को अपना निशाना बनाया , कहीं बीच सड़क पर खून की होली खेली गई .
हर बार की तरह इस बार भी सरकारों के वादे थोथे ही साबित हुए , सुरक्षा की धज्जियाँ सरे आम उड़ाई  गई , स्वास्थ्य की गन्दी चादर सबके सामने आ गई , अनजाने रोगों और व्याधियों से हजारों लोग मरते रहे ,हमारे वैद्ध्य , हकीम जड़ी बूटियाँ ही खोजते रहे , जमाखोरों की तिजोरियों में पैसा घुसता रहा , गरीब लोग रोटी , पानी और छत के लिए दौड़ते रहे 
नए विकसित शहर की सुन्दरता में कील -मुहासे से उगी झुग्गी -बस्तियों को उखाड़ने का प्रयास चलता रहा , राजा की जय -जयकार करने के लिए राज पथ को दुल्हन सा सजाया जाता रहा , भीतर की चरमराहट को कोई नहीं सुन सका , क्योंकि राजा भी कभी इन्सान था , तो , वह भी राज की नीति का शिकार है , बिल्लियों के बंटवारे में बन्दर बनाना वह भी जानता है ,पर क्या करे !! उसे तो कुत्ते , शृगाल , बन्दर , बिल्ली सभी से बचाना है , वरना सिंहासन हिलाते देर कहाँ लगती है , 
कभी मतदान के लिए शहर को सर पर उठा लिया , कभी पानी को भी तरसा दिया , अफसरों को चिंता रहती है बागड़ के हरे पौधों को बकरी न खा जाये , उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं कि कचरे के डिब्बे से बच्चा खाना खोज  कर खा रहा है , स्कूल न जाकर बच्चे चाय क्यों बेच रहे हैं ? बाजार की हाट में नाडा बेच रहे हैं , 
यह तो , नियति है , कह कर पल्ला झड देने वाली संस्थाएं धन का उपभोग कर रहीं हैं , जब , सरकारी कर्मचारी का वेतन बढता है , दूसरे दिन बाजार का भाव बढ़ जाता है , हुआ सब बराबर , सरकार के ही भेदिये हाय -हाय के नारे लगाते हैं और बेचारा मजदूर भूखा सोने पर मजबूर हो जाता है , 
पूरा बरस इन्हीं उठा -पटक में निकल गया , न किसी को नौकरी मिली , न सांत्वना ही मिली , मानवता के प्रति शत्रुता की यह अमर बेल आखिर कब सूखेगी ? हम , सब वहीँ खड़े हैं , जहाँ से आगे चले थे , एक नै रौशनी के इंतजार में ....

रेनू शर्मा ....

2 comments:

M VERMA said...

अफसरों को चिंता रहती है बागड़ के हरे पौधों को बकरी न खा जाये , उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं कि कचरे के डिब्बे से बच्चा खाना खोज कर खा रहा है'
जमीनी सच्चाई को उकेरती रचना. जायज चिंता

संजय भास्कर said...

ढेर सारी शुभकामनायें.