Saturday, July 25, 2009

एक उम्र के बाद ....


एक बार मैं ऊँची पहाडी पर बने देव स्थान पर गई , सुना था ईश्वर ऊपर रहता है , चलो देखें कितना ऊपर रहता है । हजार से अधिक सीडियां चढ़कर अथक परिश्रम के बाद ऊपर पहुँची तो , असीम आन्नद की अनुभूति हुई । मन्दिर प्रांगण में अपार उर्जा का भण्डार था , हम घूमते हुए मन्दिर के पीछे चट्टानों के पास चले गए , जहाँ से नीचे का दृश्य बड़ा मनोहर लग रहा था । मानो बड़े से कैनवास पर छोटे से खेत , घर , सड़क , गलियां , पेड -पौधे सब बने हैं । सब कुछ अकल्पनीय सा लग रहा था ।

तभी हमारे पास एक युगल आक़र बैठ गया , थोडी देर तक तो वे लोग चुप बैठे रहे , फ़िर उन्होंने एक दूसरे को उलाहने देने शुरू कर दिए , अपशब्द के बाद धिक्कारना भी शुरू हो चुका था । युवती जो उस युवक की पत्नी लग रही थी , आपा खोने लगी , क्यों तुम्हारे साथ जिंदगी बाँध ली मैंने ? चीख कर युवक से बोली - राकेश !! तुमने एक शब्द भी बोला तो , यहीं से कूद कर जान दे दूंगी , समझे !!

मैं , अवाक् थी , क्या करुँ ? कुछ समझ नही आ रहा था , कहाँ तो मैं , प्रकृति की सुन्दरता पर मोहित हो रही थी और अब , जिंदगी - मौत के जाल में फंस गई हूँ , धीरे से उठकर उसके पास गई , पहले पानी दिया , उसका नाम पूछा - वीथिका नाम था । फ़िर उसके पति से अलग ले गई , उसे समझाया बेटा !! धीरज रखो , बहस मत करो , शांत रहो , सोचो - कहीं तुमसे गलती तो नही हुई ? उसका हाथ मेरे हाथ में था , पसीने से लथपथ हो रहा था । वीथिका थोड़ा शांत हो गई । उसकी आँखें भर आईं , मुझे थैंक्स बोला और अपने पति के पास जाकर , घर चलने को कहा और सॉरी बोला । वे लोग चले गए ।

मैं , हतप्रभ सी, पूरा मंजर समझने का प्रयास करती रही , जितनी उर्जा मैंने अर्जित की थी , सब जाने कहाँ तिरोहित हो गई । शाम तक मेरा मन उदास रहा ।

अच्छा उत्तमा !! तुम मेरी जगह होतीं तो क्या करतीं ? मैं , यार !! पति -पत्नी के बीच क्या करती , अगर तुम्हें वीथिका फटकार देती , या बात ही न करती तब तुम क्या करतीं ? ऐसा नही है , उत्तमा ! पति के साथ क्या कोई अकेला नही हो सकता ? अरे ! तुम बताओ क्या करतीं ? मैं , तो डर कर ख़ुद ही भाग जाती । लडो मरो , मैं , चली । अगर मैं , युवती होती तो उस समय चुप रहती , लेकिन वापस आकर उस राकेश की ऐसी -तैसी कर देती । सार्वजनिक रूप से झगडा नही करती इतना तो पक्का है ।

सुनयना !! तुम भी तो वीथिका हो सकतीं थीं ? तब क्या होता ? हाँ , चुप रहने का प्रयास करती , अगर पानी सर से ऊपर जाने लगता तब , वापस चली जाती और आगे से कभी भी उस राकेश के साथ बाहर नही जाती । मैंने , धीरे से ख़ुद को देखा और सोचा- एक उम्र के बाद .....इंसान कितना बदल जाता है .मैं , बोल तो रही हूँ , क्या करती , क्या न करती । हजार तरह के नुस्खे बताने को तैयार हूँ पर जब हम युवा होते हैं तब बात कुछ और होती है ।

उत्तमा !! कोई स्टेशन आने वाला है , लगता है अब तुम्हारी धरा भी, थमने वाली है , अब इतना भी मजाक मत बनाओ , देखो स्टेशन पर लोगों को कितनी आपाधापी रहती है , हाँ , सुनयना !! मुझे याद है - उस दिन मैं , लोकल से घर जा रही थी ....

क्रमश :......

5 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

badhiya rachana..
achcha laga ..badhayi!!!

M VERMA said...

अच्छी रचना

Atmaram Sharma said...

मार्मिक रचना. आपको पढ़ते हुए सुखद लगा.

संगीता पुरी said...

अच्‍छी रचना .. अगली कडी का इंतजार रहेगा !!

Pakhi said...

Nice creativity...congts.

पाखी की दुनिया में देखें-मेरी बोटिंग-ट्रिप !!