Thursday, July 2, 2009

वात्स्यायन आओ न !!


सदियों पूर्व शिक्षा के क्षेत्र में आचार्य वात्स्यायन ने यौन शिक्षा पर आधारित अपना महान ग्रन्थ " काम शास्त्र " समाज को समर्पित कर एक नया अध्याय शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में जोड़ दिया था । आचार्य वात्स्यायन के बारे में पता चलता है कि वे एक महर्षि थे , उनके पास शिष्य शिक्षा प्राप्त करने आश्रम में आया करते थे । वात्स्यायन खोजी प्रवृति के ज्ञानी व्यक्ति थे ।

तत्कालीन समाज में राजाओं की विलासी प्रवृति सर्वाधिक उच्च स्थान पर थी । राजा ,प्रजा व समाज के विकास से अधिक विलासिता पर ध्यान देते थे , महाकवि शूद्रक रचित " मृच्छ्कतिकम " से पता चलता है कि वेश्याओं को राजाश्रय प्राप्त था , वे वैतनिक कर्मचारी होते थे । वेश्याओं को खुलेआम रतिसुख प्राप्त करने का अधिकार था , वैश्याएँ काम शास्त्र में पारंगत होती थीं ।

समझ सकते हैं कि हमारे समाज का एक वर्ग वासना में लिप्त रहकर काम विषयक शोध करता था और योग , ध्यान , आध्यात्म से उसे जोड़कर उच्चता प्रदान करता था । वात्स्यायन का " कामशास्त्र " इसका उदहारण है । प्रकृति के साथ मानवीय तादात्म्य स्थापित करना , विलास का स्थान , भाव ,विचार , पशु -पंछी सब काम भाव के उद्दीपन का काम करते हैं । उन्होंने गंभीरता से भावों -विचारों पर मनन चिंतन कर अपने ग्रन्थ का निर्माण किया था ।

वैभव सम्पन्न राजा विशाल मंदिरों , भवनों का स्थापत्य करवाते थे , उनकी प्रजा को रोजगार मिले , राजा के वंश का उल्लेख शिलाओं कि नसों में प्रवाहित हो इसके लिए वे भव्य मंदिरों , चेत्यों का निर्माण करवाते थे । कहा जाता है कि पृथ्वी पर जब , आध्यात्म की अधिकता हो गई तब, देवता भी अपने लोकों में अपने तेज की वृद्धि करने के लिए ध्यान मग्न हो गए । पृथ्वी पर उनका आगमन अवरुद्ध हो गया , स्रष्टि में स्थिरता आ गई तब , देवताओं को पृथ्वी पर आकर्षित करने के लिए आदमकद पशन प्रतिमाओं के युगल शिल्प रतिक्रिया लिप्त , विलासिता युक्त , मंदिरों , प्रसादों की भव्यता को दर्शाते हुए उत्कीर्ण कराये गए । देवताओं का आह्वाहन किया गया

काम भाव को जाग्रत करने का असर कलियुग में स्पस्ट रूप से दिखाई देता है । हम उन मंदिरों को आज भी देख और समझ सकते हैं । समाज की विक्र्तियाँ भी समझ आती हैं ।

आज शिक्षा का विकास सर्व साधारण के लिए किया जा रहा है , फ़िर भी , समाज से अज्ञानता दूर होने के स्थान पर और पनपती जा रही है । कहा जाता है कि जब व्यक्ति उन्मादी या पागल हो जाता है तब , पशुवत व्यवहार करने लगता है । पशुवत का आशय है बिना सोचे समझे किसी काम को करना । शिशु के बोलना शुरू करते ही हम नैतिक मूल्य सिखाने लगते हैं , बड़ा होते ही भारतीय मूल्यों को भुला देता है ।

सम्पूर्ण विश्व में भारतीय मूल्य , सभ्यता , संस्कृति की क़समें खाई जाती हैं , पर कानून विद अपराधों के संरक्षण के लिए ही विधान बना देते हैं । काम भाव की विकृति भी हजारों अपराध पैदा करती है , उसके लिए दंड विधान को लचीला बना देना भी अपराध है । बालकों के प्रति किए गए अपराधों के लिए दंड का संशोधन कर , पाप कृत्य को ही मान्यता प्रदान कर दी गई है । भारतीय युवकों को बरगला कर भारतीयता की धज्जियाँ उडाई जा रही हैं । भारत को फ़िर से गुलाम बनने के प्रयास किए जा रहे हैं ।

स्वछंदता और आजादी के नाम पर शारीरिक , मानसिक पवित्रता का नाश किया जा रहा है । हमारे कानून को ही बदलवाया जा रहा है । यह भारत के लिए अभिशाप साबित हो सकता है । किसी षड़यंत्र के तहत ही इस प्रकार के कानून लागु किए जा रहे हैं । वासना की हदें पार की जा रही हैं । कहाँ गए ? भारतीय संस्कृति के रखवाले । क्या हो रहा है ? वात्स्यायन आज होते तो शर्म से सर झुका लेते , शायद चुल्लू भर पानी की मांग कर बैठते । किसी ने ठीक ही कहा है - जब , विपत्ति आती है तब , मति भ्रष्ट हो जाती है ।

रेनू शर्मा ...

7 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

वो भी गहरे सोच में डूबे होंगे ईश्वर की भाँती की देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान !!!

संदीप शर्मा said...

बहुत ही भावपूर्ण आलेख है... मेरा मानना है की समलैंगिकों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी मंजूरी के सन्दर्भ में आपने लिखा है... यदि नहीं भी तो भी एसा आलेख प्रशंशा योग्य है...

M Verma said...

भारतीय संस्कृति के रखवाले । क्या हो रहा है ? ----------------------------
sampurn lekhan ke liye sadhuvad. sanskriti kee virasat amulya hai.

mukesh said...

sach kaha apne .
badhai aaj shiddat se vatshayan ko yad karne ke liye

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

शायद इसी को कहते हैं कि विनाश काले विपरीत बुद्धि!!!!

गिरिजेश राव said...

इतने अच्छे उठान के बाद आखिरी तीन पैरा में जल्दीबाज लेक्चर !

बचा जा सकता था। बहुत अच्छा लेख होता। मैं तो कहूँगा कि आखिरी 3 पैरा फिर लिखें- संयत और विचारशील हो कर।

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

लेख बहुत पसंद आया ,सही सन्दर्भों में लिखा गया है , परन्तु अंतिम तीन पैरा आपस में कुछ 'भाव पुनाराक्ति '' से लगते हुए आलेख को कुछ लम्बा करते प्रतीत हो रहे हैं शायद यही कारन है की अंत में भाव गडमड से लगने लगते हैं | पुनः संपादित कर अंतिम तीन पैरा के मैटर को सुगठित कर केवल दो में समेट प्रस्तुत करें तो विषय की रोचकता , स्पष्टता तथा प्रभावोत्पादकता कुछ और बढेगी ही ,ऐसा मुझे लगा है |
खैर छोडिये सदैव लेखक की इच्छा और भावना सर्वोपरि होती है |

जैसे आप का कहना है उसी प्रकार नवाबी काल में अवध-क्षेत्र में वेश्याओं के पास कुलीन सम्मानित घरों के युवकों को तहजीब सीखने के लिए भेजा जाता था खास तौर से महफिली तहजीब |
वैसे लीक से हट एवं वर्जित क्षेत्र के विषय पर एक अच्छे आलेख के लिए पुनः बधाई|

हाँ ,ऐसे विषय की प्रस्तुति वो भी एक स्त्री द्वारा ,पारंपरिक समाज के बहुतों को हाई वोल्टेज करेंट तो लगेगा ही |

मैंने तो ' मृच्छ्कतिकम ' को '' मृच्छ्कटिकम '' नाम पढ़ा था ,लगता है '' गूगल बाबा '' की कृपा है