Thursday, September 11, 2008

स्वर्ण का तिलिस्म


जानकी ने पंचवटी मै विशामतायो के बीच रहते हुए भी , स्वर्ण मृग देखते ही , श्री राम के सामने उसे पाने की अभिलाषा उजागर कर दी । शंका वश सीता को समझाने का प्रयास किया गया लेकिन सम्मोहन ग्रस्त जानकी ने हट नही छोड़ी । अंतत : सीता का अपहरण रावन द्वारा कर लिया गया ।
अब यहाँ स्पष्ट है कि चाहे देव योनी से पृथ्वी पर आया मानव हो , परम तत्व हो , शक्ति पुंज हो , स्वर्ण की लालसा , धन की जिज्ञासा , हीरा जवाहरात , रत्न पाने का मोह बढता ही है । त्याग और विरक्तता जैसी बातें खोखली ही लगाती हैं ।
चक्रवर्ती सम्राट जीवन की संध्या कल मै सब त्याग कर लोक मै अमरता प्राप्त करते थे । आज प्रजा मै धार्मिक उन्माद जाग्रत करने वाले साधू संत , महात्मा , विद्वान , प्रवचन करता आदि सब शाही पण को भोगते हैं । ईश्वर के पास तो सांसारिक त्याग के बाद ही पहुंचा जा सकता है , भक्त जन स्वयम इस त्याग के लिए तत्पर करते हैं , लेकिन ईश्वरीय मार्ग का प्रदर्शक ही विशाल सिंहासन पर विराजमान रहता है । वे आभूषणों से सजे किसी अप्सरा से कम नही लगते । वातानुकूलित पंडालों मै नदी सी बहती जनता को लच्छेदार बैटन मै बाँध कर पाठ पड़ते हैं ,।
आध्यात्म की शिक्षा , धर्मग्रन्थों का सार समझाना जतन का काम है । इस जतन की फीस लाखों रुपयों तक हो जाती है । व्यवसाय बना यह धर्म का खेल अब प्रतिदिन एक नया गुरु पैदा कर रहा है । श्रोता बड़ी लगन से सुनते हैं लेकिन घर आकर सब भूल जाते हैं । वही बहुयों के साथ कलह करना , बुजुर्ग घर के मालिकों को अपमानित करना शुरू हो जाता है । फ़िर क्या हासिल हुआ प्रवचन से ?
गुरुयों की स्वर्ण ममता के सामने भक्त स्वयम को अकिंचन सा अनुभव करने लगता है । एक विरक्ति का आभास होता है । माया का जल समझ आने लगता है । मृग मरीचिका से भ्रमित इन्सान जानकी की तरह सम्मोहित हो जाता है , धर्म की नीति की भी अपनी एक कूट नीति होती है जिसके जाल से मानव को निकलना चाहिए । इस धंधे की धुंध को छांटना चाहिए , ज्ञान मृग का अनुसरण करना चाहिए ।
रेनू शर्मा .......

1 comment:

मुकेश कुमार मिश्र said...

आपकी बात विल्कुल सत्य है । आज आवश्यकता इस बात है कि हम ईशावास्योपनिषद् के इस मन्त्र को आत्मसात् करें-
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चजगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधकस्यस्विद्धनम् ॥
जब तक हम इस बात को नहीं समझेंगे कि सुख धन में नही वरन् ज्ञान मे है, ऐसे ज्ञान में जिसमें तेरा-मेरा का भाव समाप्त हो जाता है, कोई अपने से पृथक् नही प्रतीत होता है, किसी से बैर नही रहता है, किसी प्रकार का लोभ और लालच नही रहता है,तभी हम सच्चे सुख का आनन्द प्राप्त कर पायेगें और वही भगवत्प्राप्ति है ।
आशा है आप आगे भी ज्ञानमय लेखों से अनुग्रहीत करेंगी । संस्कृत से पी.एचडी हैं जानकर प्रसन्नता हुई ।